असंबध मध्यतो मानवानां यस्या उहतः प्रयतः समं बहु। नानावीर्य ओषधीर्य विभर्ति पृथिवी नः पृथं राध्यतां नः।।
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यल्य पूर्व पूर्वजना विचित्ररे यस्यों देवा असुतनम्यवर्तयन्।।15।। ग्यामस्यानां व्यासश्च विष्ठा भाग वाचः पृथिवी नो दधातु।।
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लेषितं तेन जातं तदु तस्मिन् प्रतिष्ठितम्।।14।। कालो ह बह भूत्वा बिभर्ति परमेषहिनम्।।
See Answer →उल्या ते जातंभतो दिवि सद्मया दारे उघ शर्म नहि श्राद।
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तच्वक्षुरेवहितं पुत्ल्लच्छुक्रमुच्वरत्।।12।। पश्येन शरदः शतः जीयेम शरदः शतं शृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम् शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्।।
See Answer →शुचि ते इच्छा व्यानो अक्षरः। अनो मनरालयं सूर्योरोहत्प्रयति पत्तिम्।।
See Answer →वेदों का प्रयोजन क्या है? स्पष्ट करें।
See Answer →मत्ति शब्द के रूढ़ लिखिए।
See Answer →वेदों में वर्णित काव्यात्मक सौन्दर्य को स्पष्ट करें।
See Answer →वेद का अर्थ स्पष्ट करते हुए वेदों के प्रकार पर प्रकाश डालें।
See Answer →वेदों की अपौरूषयता और नित्यता पर प्रकाश डालें।
See Answer →अथर्ववेद के सामाजिक व्यवस्था राजनैतिक व्यवस्था का वर्णन करें।
See Answer →वैदिक साहित्य में कितने प्रकार के वेद बताए गए हैं।
See Answer →अथर्ववेद की प्रमुख शाखाओं का वर्णन करें।
See Answer →पैगानिक विज्ञान क्या है? स्पष्ट करें।
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