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 सूर के काव्य न ब्रज का लोकजीवन किन रूपों में आया है? सोदाहरण उल्लेख कीजिए ।

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 रसखान की भक्ति भावना की विशिष्टताओं का सोदाहरण उल्लेख कीजिए ।

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 मीराबाई की भक्ति भावना

 सतसई परम्परा और बिहारी सतसई

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 रहीम लोक जीवन के पारखी थे। इस कथन की समीक्षा कीजिए I

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तुलसीदास की भक्ति में प्रेम के महत्व की विवेचना कीजिए ।

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ससंदर्भ व्याख्या कीजिएः

 

 गोरी सोवै सेज पर मुख पर डारे केस ।

चल खुसरो घर आपने रैन भई चहुँ देस ॥
सरो रैन सोहाग की, जागी पी के संग।
तन मेरो मन पिऊ को दोऊ भए एक रंग ॥

 हम न मरें मरिहै संसारा ।
हमको मिला जिआबनहारा ।।
साकत मरहिं संत जन जीवहिं भरि भरि राम रसाइन पीवहिं ।

हरि मरहिं तो हमहूँ मरिहैं, हरि न मरे हम काहे कौ मरिहैं ।

कहै कबीर मन मनहिं मिलावा अमर भया सुखसागर पावां ।।

 

अंखियां हरि-दरसन की प्यासी ।
देख्यौ चाहत कमलनैन कौ निसिदिन रहति उदासी ।।

आए उधौ फिरि गए आंगन, डारि गए फांसी ।
केसरि तिलक मोतिन की माला, वृन्दावन के बासी ।।

काहू के मन को कोउ न जानत लोगन के मन हांसी ।

सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस को करवत लैहौं कासी ।।

 

 खेती न किसान को भिखारी को न भीख, बलि, बनिक को बनिज, न चाकर को चाकरी ।

जीविका विहीन लोग सीदमान सोच बस, कहैं एक एकन सों, 'कहाँ जाई का करी?

बेदहूँ पुरान कही लोकहूँ बिलोकिअत, साँ सबै पै, राम! रावर कृपा करी ।

दारिद - दसानन दबाई दुनी, दीनबंधु ! दुरित - दहन देखि तुलसी हहा करी ।।

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 टिप्पणी लिखिए।

 'मिसपाल' कहानी का प्रतिपाद्य

 

 'पाजेब' कहानी के शीर्षक की सार्थकता

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 'उसने कहा था' कहानी के शीर्षक की सार्थकता को स्पष्ट कीजिए।

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हिंदी कहानी के विविध आंदोलनों पर प्रकाश डालिए।

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 हिन्दी कहानी को परिभाषित करते हुए कहानी के प्रमुख तत्वों का उल्लेख कीजिए ।

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 "सोचो माँ को मेरा घर में होना ही बुरा लगता था। पिताजी को मेरे संगीत सीखने से चिढ़ थी। वे कहा करते थे कि मेरा घर-घर है रंडीखाना नहीं। भाइयों का जो थोड़ा-बहुत प्यार था, वह भी भाभियों के आने के बाद छिन गया। मैंने आज तक कितनी-कितनी मुश्किल से अपनी अम्...अ... पवित्रता को बचाया है, यह मैं ही जानती हूँ। तुम सोच सकते हो कि एक अकेली लड़की के लिए यह कितना मुश्किल होता है। मेरा लाहौर की तरफ घूमने जाने को मन था वहाँ की कुछ तस्वीरें बनाना चाहती थी, मगर मैं वहाँ नहीं गई, क्योंकि मैं सोचती थी कि मर्द की पशु-शक्ति के सामने अम्...अ. मैं अकेली क्या कर सकूँगी। फिर, तुम्हें पता है कि डिपार्टमेंट के लोग वहाँ मेरे बारे में कैसी बुरी-बुरी बातें किया करते थे। इसीलिए मैं कहती हूँ कि मुझे वहाँ के एक-एक आदमी से नफरत है।"

 "ह्यूबर्ट ही क्यों, वह क्या किसी को चाह सकेगी, उस अनुभूति के संग, जो अब नहीं रही, जो छाया-सी उस पर मँडराती रहती है, न स्वयं मिटती है, न उसे मुक्ति दे पाती है। उसे लगा, जैसे बादलों का झुरमुट फिर उसके मस्तिष्क पर धीरे-धीरे छाने लगा है, उसकी टाँगे फिर निर्जीव, शिथिल-सी हो गयी हैं।"

 "मुंशी जी के निबटने के पश्चात सिद्धेश्वरी उनकी जूठी थाली लेकर चौके की जमीन पर बैठ गई। बटलोई की दाल को कटोरे में उड़ेल दिया, पर वह पूरा भरा नहीं। छिपुली में थोड़ी-सी चने की तरकारी बची थी, उसे पास खींच लिया। रोटियों की थाली को भी उसने पास खींच लिया। उसमें केवल एक रोटी बची थी। मोटी भद्दी और जली उस रोटी को वह जूठी थाली में रखने जा रही थी कि अचानक उसका ध्यान ओसारे में सोए प्रमोद की ओर आकर्षित हो गया। उसने लड़के को कुछ देर तक एकटक देखा, फिर रोटी को दो बराबर टुकड़ों में विभाजित कर दिया। एक टुकड़े को तो अलग रख दिया और दूसरे टुकड़े को अपनी जूठी थाली में रख लिया। तदुपरांत एक लोटा पानी लेकर खाने बैठगई। उसने पहला ग्रास मुँह में रखा और तब न मालूम कहाँ से उसकी आँखों से टप टप आँसू चूने लगे।"

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'आम रास्ता नहीं है' का कथासार लिखिए।

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'रजिया' रेखाचित्र का प्रतिपाद्य बताइए।

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 महाकवि जयशंकर प्रसाद 'संस्मरण' के माध्यम से प्रसाद जी के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिए

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 'मेरे राम का मुकुट भीग रहा है' निबंध के महत्व पर प्रकाश डालिए।

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. 'गिल्लू' रेखाचित्र का सारांश लिखिए।

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 'करुणा' निबंध का प्रतिपाद्य लिखिए।

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निबंध की परिभाषा बताते हुए निबंधों के वर्गीकरण पर प्रकाश डालिए।

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 सप्रसंग व्याख्या लिखिए :

 

" राजा हरिश्चंद्र ने अपनी रानी शैव्या से अपने ही मृत पुत्र के कफन का टुकड़ा फड़वा नियम का अद्भुत पालन किया था। पर यह समझ रखना चाहिए कि यदि शैव्या के स्थान पर कोई दूसरी स्त्री होती तो राजा हरिश्चंद्र के उस नियम पालन का उतना महत्व न दिखाई पड़ताय करुणा ही लोगों की श्रद्धा को अपनी ओर अधिक खींचती है। करुणा का विषय दूसरे का दुख हैय अपना दुख नहीं। आत्मीय जनों का दुख एक प्रकार से अपना ही दुख है। इससे राजा हरिश्चंद्र के नियम पालन का जितना स्वार्थ से विरोध था उतना करुणा से नहीं। "

 "हृदय के भीतर जलनेवाली विरहाग्नि ने उसे किसी काम का नहीं छोड़ा। हे भगवान, तुम ऐसा कुछ नहीं कर सकते कि सारे गाँव के समान इस बालिका को भी चंद्रमा उतना ही शीतल लगे जितना औरों को लगता है! अर्थात् विरहिणी की दारूण-व्यथा अब सब के चित्त की सामान्यअनुभूति के साथ ताल मिलाकर चलने लगी। पागल का श्लगनाश् एक का लगना होता है, कवि का लगना सबको लगने लगता है। बात उलट कर कही जाय तो इस प्रकार होगी जिसका लगना सबको लगे वह कवि है, जिसका लगना सिर्फ उसे ही लगे, औरों को नहीं, वह पागल। लगने लगने में भी भेद है। जो सबको लगे, वह अर्थ है, जो एक को ही लगे, वह अनर्थ है। अर्थ सामाजिक होता है।"

 "हाँ, उसके रूखे केश धीरे से कुछ कह गए। कुछ सुना है और अधिकांश अनसुना रह गया। पेट ही पहार है, इन केशों को सँवारने की किसे फुरसत है। यह जलता हुआ जमाना, यह महामारी-सी महँगाई, यह काल-सा अकाल ! जिनके लाल सूखे वक्ष की ठठरियों को चिचोर-चिचोर कर

चिल्लाते हैं, जिनके लिए मनुष्य ही भगवान है, जिनके लिए मुट्ठी भर अन्न ही मोक्ष सुख है उनके लिए क्या केश और क्या श्रृंगार ! क्या अनुराग और क्या सुहाग !"

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ललित निबंध के उद्भव और विकास पर प्रकाश डालिए।

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