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नीतिकाव्य परंपरा का परिचय दीजिए।

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 श्रम विभाजन के परिणामों पर मार्क्स के विचार स्पष्ट कीजिए।

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समाज की मार्क्सवादी धारणा स्पष्ट कीजिए।

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आर्को प्ररूप से वेबर का क्या तात्पर्य था?

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खैर, खून, खाँसी, खुसी, बैर प्रीति मदपान। रहिमन दाबे ना दबें, जानत सकल जहान।।

मूलन ही की जहाँ अधोगति केशव गाइय। होम हुताशन धूम नगर एकै मलिनाइय।। दुर्गति दुर्गति ही जु कुटिल गति सरितन ही में। श्रीफल को अभिलाष प्रगट कवि कुल के जीमें।।

मोर-पंख 'मतिराम किरीट प्रथम, कंठ बानी बनमल सुहाई। मोहन की मुस्कान सुन्दर है, कुण्डल छवि हिलोरे ले रही है। लोचन लोल विशाल बिलोकनि, को ना बिलोकि भयो बस माई। उस मुँह की मिठास कहाँ है? मीठी लगती है नयन-लुनाई।

सांसन ही सों समीर गयो, अरु आंसुन ही सब नीर गयो ठरि। तेज गयो गुन लै अपनो, अरु भूमि गई तन की तनुता करि।। देव जिये मिलिबेही की आस, कि आसहु पास अकास रह्यो भरि। जा दिन ते मुख फेरि, हरे हंसि, हेरि, हियो जु लियो हरि जू हरि।।

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सामाजिक विज्ञान में मूल्य पर वेबर के विचार प्रस्तुत कीजिए।

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 यांत्रिक एकात्मकता और सावयवी एकात्मकता में क्या अंतर है?

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सामान्य एवं व्याधिकीय सामाजिक तथ्य में विभेद के नियम की व्याख्या कीजिए।

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'सामूहिक चेतना' से दुर्खाइम का क्या तात्पर्य था?

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'सामूहिक चेतना' से दुर्खाइम का क्या तात्पर्य था?

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आपके विचार से क्या पूँजीवाद व्यवस्था में वर्ग संघर्ष के कारण क्राँति होगी, जिसके फलस्वरूप समाजवाद आयेगा? मार्क्स के लेखन के संदर्भ में चर्चा कीजिए।

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धर्म के समाजगास्त्र पर दुर्खाइम के योगदान की चर्चा कीजिए।

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पूँजीवाद क्या है? पूँजीवाद पर मार्क्स और वेबर के विचारों की तुलना कीजिए।

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 'मतिराम' के काव्य में प्रकृति वर्णन

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बेनी प्रवीन

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'केशवदास' के काव्य-वैशिष्ट्य पर प्रकाश डालिए।

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 'देव' की रचनाओं का परिचय देते हुए उनकी विशेषताएँ बताइए।

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नीतिकाव्य परंपरा का परिचय दीजिए।

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खैर, खून, खाँसी, खुसी, बैर प्रीति मदपान। रहिमन दाबे ना दबें, जानत सकल जहान।।

मूलन ही की जहाँ अधोगति केशव गाइय। होम हुताशन धूम नगर एकै मलिनाइय।। दुर्गति दुर्गति ही जु कुटिल गति सरितन ही में। श्रीफल को अभिलाष प्रगट कवि कुल के जीमें।।

मोर-पंख 'मतिराम किरीट प्रथम, कंठ बानी बनमल सुहाई। मोहन की मुस्कान सुन्दर है, कुण्डल छवि हिलोरे ले रही है। लोचन लोल विशाल बिलोकनि, को ना बिलोकि भयो बस माई। उस मुँह की मिठास कहाँ है? मीठी लगती है नयन-लुनाई।

सांसन ही सों समीर गयो, अरु आंसुन ही सब नीर गयो ठरि। तेज गयो गुन लै अपनो, अरु भूमि गई तन की तनुता करि।। देव जिये मिलिबेही की आस, कि आसहु पास अकास रह्यो भरि। जा दिन ते मुख फेरि, हरे हंसि, हेरि, हियो जु लियो हरि जू हरि।।

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 शारीरिक श्रम

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