आपा मेटवा हरि मिले, हरि भेंटवा सब जाइ।
अकथ कहाणी प्रेम की, कह्या न को पत्याइ ।।
बोलत हीं का कहिये रे भाई,
बोलत बोलत तत्त नसाई
बोलत बोलत बढ़ै बिकारा, बिन बोल्यां क्यूँ होइ बिचारा ।।
संत मिलै कछु कहिये कहिये, मिलै असंत मुष्टि करि रहिये ।।
ग्याँनी सूँ बोल्या हितकारी, मूरिख सूँ बोल्यां झष मारी।।
कहे कबीर आधा घट डोलै भरया होइ तो मुखों न बोलै ।।
कबीर हरि का भावता, दूरै थैं दीसंत।
तन पीणा मन उनमनों, जग रूठड़ा फिरंत।।
रविदास का निर्गुण काव्य में योगदान
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माँगत भीख फिरी बन ही बन झूठी ही बातन के पन पाने।।
और की नारिन के मुख जोबत लाज गही कछु होहु सयाने।
राधा जल बिहरति सखियनि संग।
ग्रीव-प्रजंत नीर मैं ठाढ़ी, छिरकति जल अपनै अपनैं रँग ।।
मुख भरि नीर परस्पर डारति, सोभा अतिहिं अनूप बढ़ी तब ।।
मनहु चंद-गन सुधा गेंड़ुवनि, डारति हैं आनंद भरे सब।।
आई निकसि जानु कटि लौं सब, अंजलििनि तैं लै लै जल डारति।
मानहु सूर कनक-वल्ली जुरि, अमृत बूँद पवन-मिस झारति।।
ऐसा चाहीँ राज मैं, जहाँ मिले सबन को अन्न ।
छोट बड़ो सभ सम बसैं, रैदास रहे प्रसन्न ।।
पेट कही सुन बउचक राजा। ऐपन सान काँपर साझा ।।
पूरन खाँड सपूरन बोरे। जहवाँ दीसहिं तहवाँ गोरे ।।
जानु सुहारी घिरत पकाये। देखत पान फूल पतराये।।
नाभी कुण्ड जो डुबकी परो। देखतहिं बूढ़ न पावइ तीरो।।
जोंनों अन्त पेट महँ नाही। अंतर क चाँद दीस परछोही।।
मध्ययुगीन नीति काव्य
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राधे के अंग के रंग रंग्यो पट, वीजुरी ज्यों घन सो तन भूमै।[2][4][7]
है प्रतिमूरति दोऊ, दुहू की, किधौं प्रतिबिंब वही घट दूमैं।।
एकहि देव दुदेह दुदेहरे, देहरे, द्वै इक देव दुहू मैं।।