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यथार्थवाद

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समकालीन आलोचना में परिवर्तन के बिंदु

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आई.ए. रिचर्ड्स के मूल्य सिद्धांत का विवेचन कीजिए | 

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ड्राइडन की तुलनात्मक और व्यावहारिक आलोचना संबंधी विचारों पर प्रकाश डालिए | 
 

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काव्य के संबंध में विलियम वर्ड्सवर्थ के विचारों की समीक्षा कीजिए | 

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काव्य संबंधी मैथ्यू ऑर्नल्ड के विचारों पर प्रकाश डालिए | 

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 ध्वनि सिद्धांत पर अपने विचार व्यक्त कीजिए। 

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रस की परिभाषा देते हुए इसके स्वरूप का विश्लेषण कीजिए | 

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शब्द-शक्ति का आशय स्पष्ट करते हुए इसके भेदों का सोदाहरण विवेचन कीजिए। 

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हिंदी के विचारकों एवं आलोचकों के काव्य प्रयोजन संबंधी विचारों पर सोदाहरण प्रकाश डालिए |
 

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अदम्य जीवन : मूल संवेदना

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क्या भूलूँ क्या याद करूँ' की संरचनात्मक विशेषताएँ

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लोभ और प्रीति' की विशेषताएँ

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'ताँबे के कीड़े" की कथावस्तु

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कलम का सिपाही' जीवनी के शिल्पगत वैशिष्ट्य पर प्रकाश डालिए | 
 

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अंधायुग' अंधों के बहाने ज्योति की कथा है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए | 

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जयशंकर प्रसाद के नाटक और रंगमंच संबंधी निबंधों के आधार पर उनकी नाट्य दृष्टि पर विचार कीजिए| 
 

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सामाजिक यथार्थ के परिप्रेक्ष्य में 'अंधेर नगरी' नाटक की समीक्षा कीजिए | 
 

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संस्कृति थी यह एक बूढ़े और अंधे की जिसकी संतानों ने महायुद्ध घोषित किए, जिसके अंधेपन में मर्यादा
गलित अंग वेश्या-सी प्रजाजनों को भी रोगी बनाती फिरी उस अंधी संस्कृति, उस रोगी मर्यादा की रक्षा हम करते
रहे सत्रह दिन।

 कविता करना अनंत पुण्य का फल है। इस दुराशा और अनंत उत्कंठा से कवि-जीवन व्यतीत करने की इच्छा
हुई | संसार के समस्त अभावों को असंतोष कहकर हृदय को धोखा देता रहा। परंतु कैसी विडंबना! लक्ष्मी के लालों
का भ्रू-भंग और क्षोभ की ज्वाला के अतिरिक्त मिला क्‍या! एक काल्पनिक प्रशंसनीय जीवन, जो दूसरों की दया में
अपना अस्तित्व रखता है! संचित हृदय कोश के अमूल्य रत्नों की उदारता और दारिद्रय का व्यंग्यात्मक कठोर
अट्टहास, दोनों की विषमता की कौन-सी व्यवस्था होगी ।

 चना खावैं तौकी, मैना।
बोलैं अच्छा बना चबैना।।
चना खायें गफूरन, मुन्नी।
बोलैं और नहीं कुछ सुन्ना।।
चना खाते सब बंगाली
जिनकी धोती ढीली-ढाली |।
चना खाते मियाँ जुलाहे।
डाढ़ी हिलती गाह बगाहे।।
चना हाकिम सब जो खाते।
सब पर दूना टिकस लगाते।।
चने जोर गरम-टके सेर

 ऐसा जीवन तो विडंबना है, जिसके लिए रात-दिन लड़ना पड़े | आकाश में जब शीतल शुभश्र शरद-शशि का
विलास हो, तब भी दांत-पर-दांत रखे मुद्दियों को बांधे लाल आंखों से एक-दूसरे को घूरा करें! बसंत के मनोहर
प्रभात में, निभृत कगारों में चुपचाप बहने वाली सरिताओं का स्रोत गरम रक्त बहाकर लाल कर दिया जाय!
नहीं-नहीं, चक्र! मेरी समझ में मानव-जीवन का यही उद्देश्य नहीं है। कोई और भी निगूढ़ रहस्य है चाहे मैं स्वयं
उसे न जान सका हूँ।
 

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बावनदास का चारिशत्रिक 
 

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