Solve your IGNOU Doubts
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Question:

सेवासदन के रचनात्मक उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।

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रंगभूमि में आदर्शवाद किस रूप में व्यक्त हुआ है? विचार कीजिए।

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प्रेमाश्रम' के औपन्यासिक शिल्प का विवेचन कीजिए।
 

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प्रेमचंद' की पत्रकारिता दृष्टि पर प्रकाश डालिए।
 

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तुम इस भ्रम में पड़े हुए हो कि मनुष्य अपने भाग्य का विधाता है। यह सर्वथा मिथ्या है।
 हम तकदीर के खिलौने हैं, विधाता नहीं। वह हमें अपने इच्छानुसार नचाया करती है। तुम्हें
क्या मालूम है कि जिसके लिए तुम सत्यासत्य में विवेक नहीं करते. पुण्य और पाप को
समान समझते हो, वह उस शुभ मुहूर्त तक सभी विघ्न बाधाओं से सुरक्षित रहेगा? सम्भव है
कि ठीक उस समय जब जायदाद पर उसका नाम चढ़ाया जा रहा हो एक फुंसी उसका
तमाम कर दे। यह न समझो कि मैं तुम्हारा बुरा चेत रहा हूँ। तुम्हें आशाओं की असारता
का केवल एक स्वरूप दिखाना चाहता हूँ। मैंने तकदीर की कितनी ही लीलाएँ देखी हैं और
स्वयं उसका सताया हुआ हूँ। उसे अपनी शुभ कल्पनाओं के साँचे में ढालना हमारी सामर्थ्य
 से बाहर है।"

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अब तक उमानाथ ने सुमन के आत्मपतन की बात जाह्नवी से छिपायी थी। वह जानते थे
कि स्त्रियों के पेट में बात नहीं पचती। यह किसी-न-किसी से अवश्य ही कह देगी और
बात फैल जाएगी। जब जाह्नवी के स्नेह व्यवहार से वह प्रसन्न होते, तो उन्हें उससे सुमन
की कथा कहने की बड़ी तीव्र आकांक्षा होती। हृदय सागर में तरंगें उठने लगतीं, लेकिन
परिणाम को सोचकर रुक जाते थे। आज कृष्णचन्द्र की कृतघ्नता और जाह्नवी की स्नेहपूर्ण
बातों ने उमानाथ को निःशंक कर दिया, पेट में बात न रुक सकी। जेसे किसी नाली में
रुकी हुई वस्तु भीतर से पानी का बहाव पाकर बाहर निकल पड़े उन्होंने जाह्नवी से सारी
कथा बयान कर दी। जब रात को उनकी नींद खुली, तो उन्हें अपनी भूल दिखाई दी, पर
तीर कमान से निकल चुका था।"   

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लज्जा अत्यंत निर्लज्ज होती है। अंतिम काल में भी जब हम समझते हैं कि उसकी उलटी
साँस चल रही है, वह सहसा चैतन्य हो जाती है और पहले से भी अधिक कर्त्तव्यशील हो
जाती है। हम दुरवस्था में पड़कर किसी मित्र से सहायता की याचना करने को घर से
निकलते हैं, लेकिन मित्र से आँखें चार होते ही लज्जा हमारे सामने आकर खड़ी हो जाती
है और हम इधर-उधर की बातें करके लौट आते हैं। यहाँ तक कि हम एक शब्द भी ऐसा
मुँह से नहीं निकलने देते, जिसका भाव हमारी अंतर्वेदना का द्योतक हो।"
 

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मैं उन बहू-बेटियों में नहीं हूँ। मेरा जिस वक्त जी चाहेगा, जाऊँगी, जिस वक्त जी
चाहेगा, आऊँगी। मुझे किसी का डर नहीं है। जब कोई मेरी बात नहीं पूछता, तो मैं
भी किसी को अपना नहीं समझती। सारे दिन अनाथों की तरह पड़ी रहती हूँ। कोई झाँकता
तक नहीं। मैं चिड़िया नहीं हूँ, जिसका पिंजड़ा, दाना-पानी रखकर बंद कर दिया जाय। मैं
भी आदमी हूँ। अब इस घर में क्षण भर न रुकूँगी। अगर कोई मुझे भेजने न जायगा, तो
अकेली चली जाऊँगी। राह में कोई भेड़िया नहीं बैठा है, जो मुझे उठा ले जाएगा और उठा
भी ले जाए, तो क्या गम। यहाँ कौन-सा सुख भोग रही हूँ।"

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उपन्यास में किसान चेतना और स्त्री चेतना

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 उपन्यास की भाषा

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अंग्रेजी उपन्यास और अठारहवीं सदी

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भारतीय उपन्यास का उदय

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 राष्ट्रीय चेतना और नवजागरण का अंत: संबंध

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प्रेमचंदेत्तर उपन्यासों में राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन के प्रतिबिम्बन का सफल प्रयास दिखायी देता है" इस कथन की
सोदाहरण व्याख्या कीजिए । 

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भारतीय भाषाओं में लिखे आरम्भिक उपन्यासों में राष्ट्रीय भावना और आन्दोलन का अंकन किन-किन रूपों में हुआ है? 
 

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 रूसी उपन्यास के संदर्भ में दोस्तोव्यस्की और तोल्सतोय की विशेषताएं बताते हुए उनकी भिन्‍न उपन्यास-दृष्टि पर टिप्पणी कीजिए। 

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पूंजीवाद के उदय ने उपन्यास की आलोचना को किस प्रकार प्रभावित किया है, व्याख्यायित कीजिए।

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उपन्यास में यथार्थ की अभिव्यक्ति के विभिन्‍न पहलुओं का सोदाहरण विवेचन कीजिए?

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संरचनात्मक भाषा विज्ञान 
 

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रूपिम की संकल्पना 

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