अमीर खुसरो की भाषागत विशिष्टताओं पर प्रकाश डालिए I
See Answer →मैंने नाम रतन धन पायौ।
बसत अमोलक दी मेरे सतगुरु करि किरपा अपणायो।।
जनम जनम की पूँजी पाई जग मैं सवै खोवायो।
खरचै नहिं कोई चोर न ले वे दिन-दिन बढ़त सवायो ।।
सत की नाँव खेवटिया सतगुरु भवसागर तरि आयो।
मीरां के प्रभु गिरधर नागर हरखि हरखि जस गायो।।
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धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ। काहूकी बेटीसों, बेटा न ब्याहब, काहूकी जाति बिगार न सोऊ ।। तुलसी सरनाम गुलामु है रामको, जाको, रुचै सो कहै कछु ओऊ। माँगि कै खैबो, मसीतको सोइबो, लैबोको एकु न दैबैको दोऊ ।।
See Answer →महादेवी वर्मा की बिंब योजना पर प्रकाश डालिए।
See Answer →पंत के काव्य शिल्प की संक्षिप्त चर्चा कीजिए।
See Answer →मैथिलीशरण गुप्त के काव्य में अभिव्यक्त राष्ट्रीय भावना पर प्रकाश डालिए।
See Answer →छायावाद के प्रमुख कवियों के कृतित्व का परिचय दीजिए।
See Answer →निराला काव्य की अन्र्तवस्तु को स्पष्ट कीजिए।
See Answer →छायावाद की पृष्ठभूमि को स्पष्ट करते हुए उसके प्रारंभ की चर्चा कीजिए।
See Answer →द्विवेदी युगीन काव्य के अभिव्यंजना शिल्प को रेखांकित कीजिए।
See Answer →भारतेंदु युगीन कविता की नवीन प्रवृतियों को रेखांकित करते हुए उस युग के प्रमुख कवियों का परिचय भी दीजिए।
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स्तब्ध ज्योत्स्ना में जब संसार
चकित रहता शिशु-सा नादान
विश्व के पलकों पर सुकुमार
विचरते हैं जब स्वप्न अजान
न जाने, नक्षत्रों से कौन
निमंत्रण देता मुझको मौन
सघन मेघों का भीमाकाश
गरजता है जब तमसाकार
दीर्घ भरता समीर निःश्वास
प्रखर झरती जब पावस धार
न जाने, तपक तड़ित में कौन
मुझे इंगित करता तब मौन
देख वसुधा का यौवन भार
गूँज उठता है जब मधुमास
विधुर उर के-से मृदु उद्गार।
See Answer →पंथ होने दो अपरिचित
पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला !
घेर ले छाया अमा बन,
आज कज्जल-अश्रुओं में रिमझिम ले यह घिरा घन,
और होंगे नयन सूखे,
तिल बुझे औ' पलक रूखे,
आर्द्र चितवन में यहाँ शत विद्युतों में दीप खेला!
अन्य होंगे चरण हारे, और हैं जो लौटते, दे शूल को संकल्प सारे
, दुखव्रती निर्माण उन्मद,
यह अमरता नापते पद,
बाँध देंगे अंक-संसृति
से तिमिर में स्वर्ण बेला !
See Answer →अखियाँ हरि दरसन की प्यासी।
देख्यौ चाहतिं कमलनैन कौं, निसि दिन रहतिं उदासी ।।
आए ऊधौ फिरि गए आँगन, डारि गए गर फाँसी।
केसरि तिलक मोतिनि की माला, वृंदावन के वासी ।।
काहू के मन की कोउ जानत, लोगनि के मन हाँसी।
सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस कौं, करवत लैहीं कासी ।।
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हरि जननी मैं बालक तेरा।
काहे न अवगुन बकसहु मेरा ।।
सुत अपराध करत है केते। जननी के चित रहें न तेते।।
कर गहि केस करै जौ घाता। तऊ न हेत उतारै माता।।
कहै कबीर इक बुद्धि बिचारी। बालक दुखी दुखी महतारी ।।
See Answer →औरों के हाथों नहीं यहां पलती हूँ
अपने पैरों पर खड़ी आप चलती हूँ
श्रमवारि बिन्दु फल स्वास्थ्य मुक्ति फलती हूँ
अपने अंचल से व्यजन आप झलती हूँ
तनु-लता-सफलता- स्वादु आज ही लाया
मेरी कुटिया में राज-भवन मन भाया।
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नैना वह छवि नहीं भुलै
दया भरी चहुँ दिसि की चितवाणी नैन कमल दल फुले
वाह अवनि वाह हंसनि छबीली वाह मस्कनि चित चोरि
वाह बतरनि मुरली हरि की वाह देखन चहुँ कोरे
वाह धीरी गति कमल फरावन कर लै गायन पछै
वाह बीरी मुख वेनु बजावती पित पिछौरी काछै
तो बस भए फीतरत है नैना छन टारत ना टारे
"हरिचंद" ऐसी छवि देख कर, निरखत तन-मन-धन सब सब हरे
See Answer →'मोह' कविता का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए।
See Answer →सुमित्रानंदन पंत के काव्य में अभिव्यक्त जीवन दर्शन को रेखांकित कीजिए।
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