जोगिया छाई रह्या परदेस।
अब का बिछड्या फेर न मिलिया, बहोरि न दियो संदेस ।।
या तन ऊपर भसम रमाऊँ, खार करूँ सिर केस ।।
भगवाँ भेष धरूं तुम कारण, हूँ हूँ चारूं देस ।।
मीरा के प्रभु गिरधरनागर जीवनि जनम अनेस ।।
कठण लगन की पीर रे, हरि लागी सोई जाने।
प्रीत करी कछु रीत न जाणी, छोड़ चले अधबीच ।।
दुख की बेला कोई काम न आवे, सुख के सब हैं मीत ।।
मीरा के प्रभु गिरधरनागर, आखर जात अहीर ।।
अँखियाँ कृष्ण मिलन की प्यासी।
आप तो जाय द्वारका छाये, लोक करत मेरी हँसी ।।
आम की डार कोयलिया बोलै, बोलत सबद उदासी ।।
मेरे तो मन (अब) ऐसी आवै, करवत लेहौं कासी ।।
मीरा के प्रभु गिरधरनागर, चरणकमल की दासी ।।
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See Answer →हिन्दी साहित्य के इतिहास ग्रंथों में कबीर के काव्य संबंधी विविध विद्वानों के विचारों का मूल्यांकन कीजिए।
See Answer →कबीर हरदी पीयरी, चूना ऊजल भाइ।
राम सनेही यूँ मिले, दुन्यूँ बरन गँवाइ ।।
हरि ठग जग कौन ठगोरी लाई,
हरि कै वियोग कैसे ज्यूं मेरी माई ।।
कौन पुरीष को काकी नारी ,अभिआन्तरि तुम्ह बिचारी ।
कौन पूत को काको बाप ,कोन करेसंताप ।
कहे कबीर ठग सों मन मन ,गई ठगोरीठग पहिचाना ।
कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आइ।
बगुला मँझ न जाणइ, हंस चुणै चुणि खाइ ।।
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See Answer →पद्यांशों की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए :
कदरि कम्भ दोइ चीर पहिराये। चाँद चलन अपुरुब घर लाये ।।
औ समतोल दीख असि धारा। देख विमोह सरँग पँतारा ।।
देखि कम्भ मोर मन तस लागा। सरमैं धरउँ खाल कैं नाँगा ।।
चौदह चाँन देखि पाँ लागहि। पाप केत बरसहिं कर ।।
रूप पुतरि गढ़ दस नख लावा। तरुवहि रकत भू तर चलि ।।
ऐसा ध्यान धरौ बनवारी, मन पवन दृढ़ सुषमन नारी।।
से जप जपुँ जो बहुरि न जपना, सो तप तपूँ जो बहुरि न तपना।।
से गुरु करूँ जो बहुरि न करना, ऐसो मरूँ जो बहुरि न मरना।।
उल्टी गंग जमुन में लाऊँ, बिन ही जल मज्जन दै पाऊँ।।
लोचन भरि-भरि बिम्ब निहारूँ, जेति विचारि न और विचारूँ।।
बूझत स्याम कौन तू गोरी।
कहाँ रहति, काकी है बेटी, देखी तहीं कहूँ ब्रज खोरी ।।
काहे कौं हम ब्रज-तन आवतिं, खेलति रहतिं आपनी पौरी ।।
सुनत रहतिं स्रवननि नंद-ढोटा, करत फिरत माखन-दधि चोरी ।।
तुम्हरौ कहा चोरि हम लैहैं, खेलन चलौ संग मिलि जोरी ।।
सूरदास प्रभु रसिक-सिरोमनि, बातनि भुरइ राधिका भोरी ।।
धूर भरे अति शोभित स्याम जू तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।
खेलत खात फिरै अँगना पग पैंजन बाजती, पीरी कछोटी ।।
व छवि को रसखानि बिलोकत बारत काम-कला निज कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी हरि हाथ सों लै गयो माखन रोटी ।।
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