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Question:

स्त्रियाँ गा रही थीं, बालक उछल रहे थे। और पुरुष अपने अँगोछों से यात्रियों को हवा कर रहे थे। इस समारोह में नोहरी की ओर किसी का ध्यान न गया, वह अपनी लठिया पकड़े सब के पीछे सजीव आशीर्वाद बनी खड़ी थी। उसकी आँखे डबडबायी हुई थीं, मुख से गौरव की ऐसी झलक आ रही थी मानों वह कोई रानी है, मानों यह सारा गाँव उसका है, वे सभी युवक उसके बालक हैं। अपने मन में उसने ऐसी शक्ति, ऐसे विकास, ऐसे उत्थान का अनुभव कभी न किया था।

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वंशीधर ने अलोपीदीन को आते देखा तो उठ कर सत्कार किया; किंतु स्वाभिमान सहित। समझ गए कि यह महाशय मुझे लज्जित करने और जलाने आये हैं। क्षमा-प्रार्थना की चेष्टा नहीं की; वरन् उन्हें अपने पिता की यह ठकुरसुहाती की बात असह्य-सी प्रतीत हुई। पर पंडित जी की बातें सुनीं तो मन की मैल मिट गयी। पंडित जी की ओर उड़ती हुई दृष्टि से देखा। सद्भाव झलक रहा था। गर्व ने लज्जा के सामने सिर झुका दिया। शर्माते हुए बोले-यह आपकी उदारता है जो ऐसा कहते हैं। मुझसे जो कुछ अविनय हुई है उसे क्षमा कीजिए। मैं धर्म की बेड़ी में जकड़ा हुआ था नहीं तो वैसे मैं आपका दास हूँ। जो आज्ञा होगी, वह मेरे सिर-माथे पर।

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रूपा को अपनी स्वार्थपरता और अन्याय इस प्रकार प्रत्यक्ष रूप में कभी न देख पड़े थे। वह सोचने लगी- हाय! कितनी निर्दय हूँ। जिसकी सम्पत्ति से मुझे दो सौ रुपया वार्षिक आय हो रही है, उसकी यह दुर्गति ! और मेरे कारण ! हे दयामय भगवान् मुझसे बड़ी भारी चूक हुई है, मुझे क्षमा करो। आज मेरे बेटे का तिलक था। सैकड़ों मनुष्यों ने भोजन पाया। मैं उनके इशारों की दासी बनी रही। अपने नाम के लिए सैकड़ों रुपये व्यय कर दिए; परंतु जिसकी बदौलत हजारों रुपये खाये, उसे इस उत्सव में भी भरपेट भोजन न दे सकी। केवल इसी कारण तो, यह वृद्ध असहाय है।

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'तलाश' कहानी का मूल्यांकन करते हुए उसका महत्व निर्धारित कीजिए।

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 'यही सच है' कहानी की कथा-वस्तु का विश्लेषण प्रस्तुत कीजिए।

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'बदू' कहानी का विश्लेषण और मूल्यांकन कीजिए।

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'डिप्टी कलेक्टरी' कहानी की अंर्तवस्तु को स्पष्ट कीजिए।

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ग्राम संवेदना और आंचलिकता के संदर्भ में नई कहानी आंदोलन पर विचार कीजिए।

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एक तो पीठ में गुदगुदी लग रही है। दूसरे रह-रहकर चम्पा का फूल खिल जाता है उसकी गाड़ी में। बैलों को डाँटो तो 'इस-बिस' करने लगती है उसकी सवारी ।.....उसकी सवारी औरत अकेली, तम्बाकू बेचनेवाली बूढ़ी नहीं! आवाज सुनने के बाद वह बार-बार मुड़कर टप्पर में एक नज़र डाल देता है; अँगोछे से पीठ झाड़ता है।.... भगवान जाने क्या लिखा है इस बार उसकी किस्मत में ! गाड़ी जब पूरब की ओर मुड़ी, एक टुकड़ा चाँदनी उसकी गाड़ी में समा गयी। सवारी की नाक पर एक जुगनू जगमगा उठा। हिरामन को सबकुछ रहस्यमय अजगुत-अजगुत-लग रहा है। सामने चम्पानगर से सिंधिया गाँव तक फैला हुआ मैदान !.....कहीं डाकिन-पिशाचिन तो नहीं?

कुछ दिनों से शकलदीप बाबू सायंकाल घर से लगभग एक मील की दूरी पर स्थित शिवजी के एक मंदिर में भी जाने लगे थे। वह बहुत चलता मंदिर था और उसमें भक्तजनों की बहुत भीड़ होती थी। कचहरी से आने के बाद वह नारायण के कमरे को झाड़ते- बुहारते, उसका बिछौना लगाते, मेज-कुर्सियां सजाते और अंत में नाश्ता करके मंदिर के लिए रवाना हो जाते। मंदिर में एक-डेढ़ घंटे तक रहते और लगभव दस बजे घर आते।एक दिन जब वे मंदिर से लौटे, तो साढ़े दस बज गए थे। उन्होंने दबे पांव ओसारे में पांव रखा और अपनी आदत के अनुसार कुछ देर मुस्कराते हुए झांक-झांककर कोठरी में नारायण को पढ़ते हुए देखते रहे।

मैं सड़क पार कर लेता हूँ। जंगली, बेमहक लेकिन खूबसूरत विदेशी फूलों के नीचे ठहर-सा जाता हूँ कि जो फूल, भीत के पासवाले अहाते की आदमकद दीवार के ऊपर फैल, सड़क के बाजू पर बाँहें बिछाकर झुक गये हैं। पता नहीं कैसे, किस साहस से व क्यों, उसी अहाते के पास बिजली का ऊँचा खम्भा जो पाँच-छह दिशाओं में जानेवाली सूनी सड़कों पर तारों की सीधी लकीरें भेज रहा है- मुझे दीखता है और एकाएक ख्याल आता है कि दुमंजिला मकानों पर चढ़ने की एक ऊँची निसैनी उसी से टिकी हुई है। शायद ऐसे मकानों की लम्ब-तड़ंग भीतों की रचना अभी भी पुराने ढंग से होती है।

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'जवाबी कार्ड' कहानी के मुख्य पात्रों का परिचय देते हुए उनकी चारित्रिक विशेषताओं को उद्घाटित कीजिए।

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'अपना-अपना कर्ज' कहानी की अंर्तवस्तु पर विचार कीजिए।

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'ओऽरे चुरुंगन मेरे' कहानी का विश्लेषण करते हुए कहानी में विन्यस्त मूल समस्या को रेखांकित कीजिए।

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'अपने लिए शोक गीत' कहानी का विश्लेषण और मूल्यांकन कीजिए।

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'दीदी' कहानी' के विभिन्न आयामों की चर्चा कीजिए।

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दीदी को रोते देखना अप्पू को अच्छा नहीं लगता। पिछवाड़े वाले कमरे की खिड़की की चौखट पर माथा टेके रो रही थी। वह तो हमेशा रोती ही रहती है। शायद नानी ने उसे गाली दी हो। वैसे नानी अप्पू को भी डाँटती रहती है। लेकिन अप्पू को रोना नहीं आता। गुस्सा आता है। अगर वह भी दीदी जैसा बड़ा होता तो दिखा देता....... इतनी बड़ी होने पर भी दीदी डॉट-फटकार क्यों सहती है। उसका चेहरा उतर जाता है। आँखें भर आती हैं....यह देखकर अकसर अप्पू वहाँ से बाहर निकल जाता।

"ठहरो! ठहरो !" कहते हुए हाथ उठाकर उसने दोनों पक्षों को शांत किया। फिर उसने तटा से पष्ठा "क्या बात है मैगा क्या मामला है?" उसका स्वर , उसका अवस्था और पहनावा देखते ही वृद्धा की हिम्मत बँधी। आवाज़ कुछ धीमी करके यथासंभव सद्भाव के साथ वह बात बताने लगी, "तुम्हीं बताओ बेटी ! यह लोग पानी के लिए आई हैं। यह कोई सरकारी नल तो नहीं है न? पैसा खर्च करके लगाया हुआ है। हर साल म्यूनिसपैलिटी को हम टैक्स भी देते हैं। ऐसे में पहले हमारे बच्चों ने आकर मना किया। इन लोगों ने बात सुनी नहीं। फिर मैंने आकर मना किया। फिर हमारा माली आया, तो वह लड़की कहती है-अगर तू मर्द है, तो कुत्ता छोड़ !" देखो तो उँगली भर नहीं है लड़की!" कहकर उँगली से सत्यवती की ओर वृद्धा ने इशारा किया।

 

 जंगल शांत हो गया। बाघिन की चीख थम गई, लेकिन किसी ने उस बारे में कुछ किया-कहा नहीं। उसी तरह डरते-डरते उनका जीवन गुजर रहा था। आकाश में एक जगह गिद्ध चक्कर काट रहे थे। दूसरे दिन और भी गिद्ध दिखे, घने झुंड में उड़ते, नीचे की ओर झपट्टा मारते, फिर ऊपर उड़ने लगते। जंगल से आती हवा से सड़ी हुई गंध तिर रही थी। अंदाज लगाने में लोगों को देर नहीं लगी- पहाड़ के नीचे कोई बड़ा अजगर मरा होगा, किसी जानवर को बाघिन अधखाया छोड़ गई होगी-ढेरों संभावनाएं थीं।

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मीरा और आंदाल की भक्ति

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 मीरा की विरह वेदना

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मुक्ताबाई

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हिन्दी साहित्य के इतिहास ग्रंथों में मीरा

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चित्तौड़गढ़ में मीरा का जीवन

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