मराठी दलित आत्मकथनों में 'अक्करमाशी की विशिष्टता को रेखांकित कीजिए।
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प्राण वही जू रहैं रिझि वाष्प रूप वही लिहिं वही रिझायो। पद देने वाले का मुखिया, पद देने वाले का मुखिया। दूध भी वैसा ही है, दही भी वैसा ही है। और कहाँ जाऊँ कहीं रसखानी की भावना भी वैसी ही प्रसन्न होती है।
See Answer →बिन गोपाल बैरिन भई कुंजें। तब ये लता लगति अति सीतल, अब भई विषम ज्याल की पुंजें ।। बृथा बहति जमुना, खग बोलत वृथा कमल फूलै, अलि गुंज। पवन पानि घनसार संजोवनि दधिसुत किरन भानु भई मुंजें।। ए, ऊधो, कहियो माधव सो बिरह कदन करि मारत लुंजें। सूरदास प्रभु को मग जोवत अँखियाँ भई बरन ज्यों गुंजें।।
See Answer →उच्च मंदिर शॉल रसोई, एक बार फिर से पकड़ नहीं होगी. यह शरीर घास का एक टुकड़ा, जली हुई घास, पिघली हुई मिट्टी के समान है। भाई, परिवार, दोस्त, सुबह भी कड़वी लगती है। घर की स्त्री उसका शरीर बन गई, वह भूत-प्रेत करके भाग गई। जब रैदास ने लूटा संसार, हम एक राम बनकर निकले।
See Answer →लगु जैस इह अहि बुतकारी। चन्दन जैफर मिरै सँवारी।। सरंग पवान लाग जनु आयी। चाहत बैंसौं जाइ उड़ायी।। बाँसपोर हुत जनु घर काँठी। अछरि जइस देखि मैं ठाढ़ी।। कॉइ पुहुप अस अंग गंधाई। रितु बसन्त चहुँ दिसि फिर आई।। संग बास नौखण्ड गंधाने। बास केतकी भँवर लुभाने ।। उपेन्दर गोयन्द चंदरावल, बरभों बिसुन मुरारि।। गुन गंधरव रिखि देवता, रूप विमोहे नारि ।।
See Answer →भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग।
See Answer →अत्याल्प या नागान्य (डी मिनिमस)।
See Answer →कृषि का विविधीकरण।
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