कबीर की उलटबाँसियाँ
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See Answer →कबीर पर गोरखनाथ का प्रभाव
See Answer →हिन्दी साहित्य के इतिहास ग्रंथों में कबीर के काव्य संबंधी विविध विद्वानों के विचारों का मूल्यांकन कीजिए।
See Answer →कबीर हरदी पीयरी, चूना ऊजल भाइ।
राम सनेही यूँ मिले, दुन्यूँ बरन गँवाइ ।।
हरि ठग जग कौन ठगोरी लाई,
हरि कै वियोग कैसे ज्यूं मेरी माई ।।
कौन पुरीष को काकी नारी ,अभिआन्तरि तुम्ह बिचारी ।
कौन पूत को काको बाप ,कोन करेसंताप ।
कहे कबीर ठग सों मन मन ,गई ठगोरीठग पहिचाना ।
कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आइ।
बगुला मँझ न जाणइ, हंस चुणै चुणि खाइ ।।
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See Answer →सूरदास की काव्य-भाषा
See Answer →रसखान की प्रेमभावना का विवेचन कीजिए।
See Answer →संत रविदास का जीवन परिचय प्रस्तुत करते हुए उनके काव्य की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
See Answer →पद्यांशों की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए :
कदरि कम्भ दोइ चीर पहिराये। चाँद चलन अपुरुब घर लाये ।।
औ समतोल दीख असि धारा। देख विमोह सरँग पँतारा ।।
देखि कम्भ मोर मन तस लागा। सरमैं धरउँ खाल कैं नाँगा ।।
चौदह चाँन देखि पाँ लागहि। पाप केत बरसहिं कर ।।
रूप पुतरि गढ़ दस नख लावा। तरुवहि रकत भू तर चलि ।।
ऐसा ध्यान धरौ बनवारी, मन पवन दृढ़ सुषमन नारी।।
से जप जपुँ जो बहुरि न जपना, सो तप तपूँ जो बहुरि न तपना।।
से गुरु करूँ जो बहुरि न करना, ऐसो मरूँ जो बहुरि न मरना।।
उल्टी गंग जमुन में लाऊँ, बिन ही जल मज्जन दै पाऊँ।।
लोचन भरि-भरि बिम्ब निहारूँ, जेति विचारि न और विचारूँ।।
बूझत स्याम कौन तू गोरी।
कहाँ रहति, काकी है बेटी, देखी तहीं कहूँ ब्रज खोरी ।।
काहे कौं हम ब्रज-तन आवतिं, खेलति रहतिं आपनी पौरी ।।
सुनत रहतिं स्रवननि नंद-ढोटा, करत फिरत माखन-दधि चोरी ।।
तुम्हरौ कहा चोरि हम लैहैं, खेलन चलौ संग मिलि जोरी ।।
सूरदास प्रभु रसिक-सिरोमनि, बातनि भुरइ राधिका भोरी ।।
धूर भरे अति शोभित स्याम जू तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।
खेलत खात फिरै अँगना पग पैंजन बाजती, पीरी कछोटी ।।
व छवि को रसखानि बिलोकत बारत काम-कला निज कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी हरि हाथ सों लै गयो माखन रोटी ।।
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See Answer →रहीम के काव्य की भाषागत विशेषताएँ बताइए।
See Answer →पद्यांशों की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए :
रहिमन जिहवा बावरी, कहिगे सरग पाताल।
तुम कहीं भीतर हो, जूता खाने वाली खोपड़ी।
मूलन ही की जहाँ अधोगति केशव गाइय।
होम हुताशन धूम नगर एकै मलिनाइय।
दुर्गति दुर्गन ही जु कुटिल गति सरितन ही में।
श्रीफल को अभिलाष प्रगट कवि कुल के जी में।
बरज्यो न मानत हौ बार-बार बरज्यो मैं,
कौन काम, मेरे इत भौन मैं न आइए;
लाज को न लेस, जग हाँसी को न डर मन,
हँसत-हँसत आन बात न बनाइए।
डार द्रुम पलना, बिछौना नवपल्लव के,
सुमन अँगूला सोहै तन छवि भारी दै।
पवन झुलावै, केकी कोर बहरावैं देव,
कोकिल हलावै हुलसावै कर तारी दे।।
पूरित पराग सों उतारो करै राई लोन
कंजकली-नायिका लतानि सर सारी दै।
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