'डिप्टी कलेक्टरी' कहानी की अंर्तवस्तु को स्पष्ट कीजिए।
See Answer →ग्राम संवेदना और आंचलिकता के संदर्भ में नई कहानी आंदोलन पर विचार कीजिए।
See Answer →एक तो पीठ में गुदगुदी लग रही है। दूसरे रह-रहकर चम्पा का फूल खिल जाता है उसकी गाड़ी में। बैलों को डाँटो तो 'इस-बिस' करने लगती है उसकी सवारी ।.....उसकी सवारी औरत अकेली, तम्बाकू बेचनेवाली बूढ़ी नहीं! आवाज सुनने के बाद वह बार-बार मुड़कर टप्पर में एक नज़र डाल देता है; अँगोछे से पीठ झाड़ता है।.... भगवान जाने क्या लिखा है इस बार उसकी किस्मत में ! गाड़ी जब पूरब की ओर मुड़ी, एक टुकड़ा चाँदनी उसकी गाड़ी में समा गयी। सवारी की नाक पर एक जुगनू जगमगा उठा। हिरामन को सबकुछ रहस्यमय अजगुत-अजगुत-लग रहा है। सामने चम्पानगर से सिंधिया गाँव तक फैला हुआ मैदान !.....कहीं डाकिन-पिशाचिन तो नहीं?
कुछ दिनों से शकलदीप बाबू सायंकाल घर से लगभग एक मील की दूरी पर स्थित शिवजी के एक मंदिर में भी जाने लगे थे। वह बहुत चलता मंदिर था और उसमें भक्तजनों की बहुत भीड़ होती थी। कचहरी से आने के बाद वह नारायण के कमरे को झाड़ते- बुहारते, उसका बिछौना लगाते, मेज-कुर्सियां सजाते और अंत में नाश्ता करके मंदिर के लिए रवाना हो जाते। मंदिर में एक-डेढ़ घंटे तक रहते और लगभव दस बजे घर आते।एक दिन जब वे मंदिर से लौटे, तो साढ़े दस बज गए थे। उन्होंने दबे पांव ओसारे में पांव रखा और अपनी आदत के अनुसार कुछ देर मुस्कराते हुए झांक-झांककर कोठरी में नारायण को पढ़ते हुए देखते रहे।
मैं सड़क पार कर लेता हूँ। जंगली, बेमहक लेकिन खूबसूरत विदेशी फूलों के नीचे ठहर-सा जाता हूँ कि जो फूल, भीत के पासवाले अहाते की आदमकद दीवार के ऊपर फैल, सड़क के बाजू पर बाँहें बिछाकर झुक गये हैं। पता नहीं कैसे, किस साहस से व क्यों, उसी अहाते के पास बिजली का ऊँचा खम्भा जो पाँच-छह दिशाओं में जानेवाली सूनी सड़कों पर तारों की सीधी लकीरें भेज रहा है- मुझे दीखता है और एकाएक ख्याल आता है कि दुमंजिला मकानों पर चढ़ने की एक ऊँची निसैनी उसी से टिकी हुई है। शायद ऐसे मकानों की लम्ब-तड़ंग भीतों की रचना अभी भी पुराने ढंग से होती है।
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'जवाबी कार्ड' कहानी के मुख्य पात्रों का परिचय देते हुए उनकी चारित्रिक विशेषताओं को उद्घाटित कीजिए।
See Answer →'अपना-अपना कर्ज' कहानी की अंर्तवस्तु पर विचार कीजिए।
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'ओऽरे चुरुंगन मेरे' कहानी का विश्लेषण करते हुए कहानी में विन्यस्त मूल समस्या को रेखांकित कीजिए।
See Answer →दीदी को रोते देखना अप्पू को अच्छा नहीं लगता। पिछवाड़े वाले कमरे की खिड़की की चौखट पर माथा टेके रो रही थी। वह तो हमेशा रोती ही रहती है। शायद नानी ने उसे गाली दी हो। वैसे नानी अप्पू को भी डाँटती रहती है। लेकिन अप्पू को रोना नहीं आता। गुस्सा आता है। अगर वह भी दीदी जैसा बड़ा होता तो दिखा देता....... इतनी बड़ी होने पर भी दीदी डॉट-फटकार क्यों सहती है। उसका चेहरा उतर जाता है। आँखें भर आती हैं....यह देखकर अकसर अप्पू वहाँ से बाहर निकल जाता।
"ठहरो! ठहरो !" कहते हुए हाथ उठाकर उसने दोनों पक्षों को शांत किया। फिर उसने तटा से पष्ठा "क्या बात है मैगा क्या मामला है?" उसका स्वर , उसका अवस्था और पहनावा देखते ही वृद्धा की हिम्मत बँधी। आवाज़ कुछ धीमी करके यथासंभव सद्भाव के साथ वह बात बताने लगी, "तुम्हीं बताओ बेटी ! यह लोग पानी के लिए आई हैं। यह कोई सरकारी नल तो नहीं है न? पैसा खर्च करके लगाया हुआ है। हर साल म्यूनिसपैलिटी को हम टैक्स भी देते हैं। ऐसे में पहले हमारे बच्चों ने आकर मना किया। इन लोगों ने बात सुनी नहीं। फिर मैंने आकर मना किया। फिर हमारा माली आया, तो वह लड़की कहती है-अगर तू मर्द है, तो कुत्ता छोड़ !" देखो तो उँगली भर नहीं है लड़की!" कहकर उँगली से सत्यवती की ओर वृद्धा ने इशारा किया।
जंगल शांत हो गया। बाघिन की चीख थम गई, लेकिन किसी ने उस बारे में कुछ किया-कहा नहीं। उसी तरह डरते-डरते उनका जीवन गुजर रहा था। आकाश में एक जगह गिद्ध चक्कर काट रहे थे। दूसरे दिन और भी गिद्ध दिखे, घने झुंड में उड़ते, नीचे की ओर झपट्टा मारते, फिर ऊपर उड़ने लगते। जंगल से आती हवा से सड़ी हुई गंध तिर रही थी। अंदाज लगाने में लोगों को देर नहीं लगी- पहाड़ के नीचे कोई बड़ा अजगर मरा होगा, किसी जानवर को बाघिन अधखाया छोड़ गई होगी-ढेरों संभावनाएं थीं।
See Answer →मीरा और आंदाल की भक्ति
See Answer →मीरा की विरह वेदना
See Answer →मुक्ताबाई
See Answer →हिन्दी साहित्य के इतिहास ग्रंथों में मीरा
See Answer →चित्तौड़गढ़ में मीरा का जीवन
See Answer →जोगिया छाई रह्या परदेस।
अब का बिछड्या फेर न मिलिया, बहोरि न दियो संदेस ।।
या तन ऊपर भसम रमाऊँ, खार करूँ सिर केस ।।
भगवाँ भेष धरूं तुम कारण, हूँ हूँ चारूं देस ।।
मीरा के प्रभु गिरधरनागर जीवनि जनम अनेस ।।
कठण लगन की पीर रे, हरि लागी सोई जाने।
प्रीत करी कछु रीत न जाणी, छोड़ चले अधबीच ।।
दुख की बेला कोई काम न आवे, सुख के सब हैं मीत ।।
मीरा के प्रभु गिरधरनागर, आखर जात अहीर ।।
अँखियाँ कृष्ण मिलन की प्यासी।
आप तो जाय द्वारका छाये, लोक करत मेरी हँसी ।।
आम की डार कोयलिया बोलै, बोलत सबद उदासी ।।
मेरे तो मन (अब) ऐसी आवै, करवत लेहौं कासी ।।
मीरा के प्रभु गिरधरनागर, चरणकमल की दासी ।।
See Answer →पंचमकार
See Answer →अवतारवाद
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