'जनपद कविता' की जन सामान्य के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाते हुए सत्ता केन्द्रों की आलोचना के कारणों पर विस्तार से टिप्पणी लिखिए।
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See Answer →"तुम लोग जमीन की टुकड़े की बात करते हों,
मुझे तो लगता है जैसे हम गरीबों की बहू
बेटियाँ उनकी शामिलात हों' भइये ने बापू की बात बीच में काटते हुए
जैसे किसी रहस्य की ओर संकेत किया।"
कण्डक्टर का तोन्दियल शरीर कपड़े फाड़कर
बाहर आने को छटपटा रहा था। बनैले सुअर
की तरह उसके चेहरे पर पान से रंगें दॉत,
उसकी भव्यता में इजाफा कर रहे थे। सुदीप
को लगा जंगली सुअर बस की भीड़ में घुस आया है।
उसने सहमकर सह यात्री को देखा,
जो निरपेक्ष भाव से अपने ख्यालों में गुम था।'
'तभी तो यह हाय तौबा मची है। कोई छोटे-बड़े का भेद नहीं।
पहले इन्हें ससुरों की परछाई से दूर रह जाता था।
अलग खाना, अलग पीना। अब तो छोटे ठाकुर, सुना है
शहरों के होटलों में एक ही कप में सभी चाय पीवै हैं।
बड़ा अन्याय, सारा धरम ही चौपट हो गया।'
See Answer →चाहे संकीर्ण कहो या पूर्वाग्रही
मैं जिस टीस को बरसो बरस सहता रहा हूं
अपनी त्वचा पर सुई की चुभन जैसे,
उसका स्वाद है एक बार चखकर देखो
हिल जाएगा पॉव तले जमीन का टुकड़ा।
बाहर पुलिस की पदचापों से धरती गूंजती
और भीतर उसका दिल दहलता है
पुलिस के बूट, रौंदते जमीन को नहीं,
उसकी छाती को रौंदाते हैं।
जैसे एक सच जो परसों रात उसने देखा था।
मेरे और तुम्हारे बीच एक रेतीला दूह है
जो किसी अंधड़ का इंतजार करने से पहले
किसी भी वक्त फट सकता है।
जिसके गर्भ से निकलेंगे गणना में लिप्त कुटिल शब्द
जिन्हें जलना होगा भक्ति भट्टी में
रोटी की महक में बदलने के लिए।
कोई भी कर सकता है तुम्हारा वध
ले सकता है बेगार
तुम्हारी स्त्री, बहिन और पुत्री के साथ कर सकता है बलात्कार
जला सकता है घर बार।
तब तुम्हारी निष्ठा क्या होती ?
बंद किले के बाहर झाँक कर तो देखो
बर्फ पिघल रही है बछड़े मार रहे हैं फुर्री
बैल धूप चबा रहे हैं और
एकलव्य पुराने जंग लगे तीरों को आग में तपा रहा है।
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