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बदलते संदर्भ में परिवार की अवधारणा और इसके उभरते रुझानों का वर्णन करें। 

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संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों यूनिफेम् डीएडब्ल्यू और सीएसडब्ल्यू के कार्यों और भूमिकाओं पर प्रकाश डालें।

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संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों यूनिफेम् डीएडब्ल्यू और सीएसडब्ल्यू के कार्यों और भूमिकाओं पर प्रकाश डालें।

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 नारीवाद और महिलाओं के सशक्तीकरण पर वर्तमान बहस पर चर्चा करें। 

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 नारीवाद और महिलाओं के सशक्तीकरण पर वर्तमान बहस पर चर्चा करें। 

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भारत में बालिकाओं की शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति पर आलोचनात्मक दृष्टि डालें। 

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भारत में बाल अधिकार सुनिश्चित करने वाले कार्यक्रमों का वर्णन करें।

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औपनिवेशिक काल से पूर्व भारत में महिलाओं की स्थिति की तुलना प्राचीन भारत से करें

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महिलाओं के विकास के लिए मुख्य नीतियों पर चर्चा करें।

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मानस का हंस' की भाषा और शैली

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आपका बंटी' के सहायक चरित्र

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प्रेमचंदयुगीन हिन्दी उपन्यास

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 मृगनयनी के परिवेश के विविध पक्षों पर विचार कीजिए।

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निर्मला उपन्यास के आधार पर निर्मला की चारित्रिक विशेषताएँ बताइए।

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 हिन्दी उपन्यास के विकास पर प्रकाश डालिए।

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निम्नलिखित गद्यांतों की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए।

(क) एक पूरा मकान बर्तन से भरा हुआ है। चाय के सेट हैं, नाश्ते की तश्तरियाँ थाल, लोटे, गिलास। जो लोग नित्य खाट पर पड़े हुक्का पीते रहते थे, बड़ी तत्परता से काम में लगे हुए हैं। अपनी उपयोगिता सिद्ध करने का ऐसा अच्छा अवसर उन्हें फिर बहुत दिनों के बाद मिलेगा। जहाँ एक आदमी को जाना होता है, पाँच दौड़ते हैं। काम कम होता है, हुल्लड़ अधिक। जरा-जरा-सी बात पर घण्टों तर्क-वितर्क होता है और अन्त में वकील साहब को आकर निर्णय करना पड़ता है।

(ख) मैं आठवीं क्लास में पढ़ता था। तब मैं क्या समहाता हूँगा, क्या नहीं समझाता हूँगा। फिर भी वह बातें मुझे बिल्कुल अच्छी नहीं मालूम हो रही थीं। जी में कुछ बेमतलब गुस्सा चढ़ता आता था। जी होता था कि वहीं के वहीं कोई दुस्सह अविनय कर डालूँ। ऐसे भाव की कोई वजह न थी, पर बाबू जी की कुछ दबी हुई स्थिति की झलक उनके चेहरे पर देखकर बड़ी खीझ मालूम हो रही थी, पर जाने मुझे क्या चीज रोक रही थी कि मैं फट नहीं पड़ा।

(ग) तुलसी ने सीढ़ियाँ पार की, ड्योढ़ी, बगीचा और फाटक पार किया, बाहर निकल आए। सड़क पर कुछ दूर जाकर उन्होंने एक बार और उस घर पर दृष्टि डाली। लगा कि जैसे जीव का अपने एक जन्म से साथ छूट रहा हो। मन अब भी सब कुछ वही चाहता है, किंतु ज्ञान यथार्थ-बोध कराता है। जो मनुष्य बनकर जन्मता है उसके मन को यह हक है कि वह असंभव से असंभव वस्तु की चाहना भी कर ले, पर उसे पाने की शक्ति और औचित्य के बिना क्या वह हक यथार्थ है ? अपनी परिस्थियिों पर विचार न करनेवाला व्यक्ति मूर्ख होता है।

(घ) बंटी अपने घर में घूम रहा है। पर अपने घर जैसा कुछ भी तो नहीं लगा रहा उसे। सर्दी के दिनों में सांझा से ही तो चारों ओर अँधेरा घुसने लगता है। और जैसे-जैसे अँधेरा घुलता जा रहा है, सब कुछ और ज्यादा-ज्यादा अपरिचित होता जा रहा है। यहाँ तो आसमान भी पहचाना हुआ नहीं लगता, हवा भी पहचानी हुई नहीं लगती। अपने घर का आसमान और अपने घर की हवा कहीं ऐसी होती है?

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शिल्पकला / मूर्तिकला

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राजकीय न्यायलय

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राजकीय न्यायलय

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